शनिवार, 29 अप्रैल 2017

प्रेम, विमर्श और सामाजिक क्रांति की अग्रदूत : सावित्रीबाई फुले


























(दलित अस्मिता वर्ष-7, अंक 26, जनवरी-मार्च 2017 अभी अभी डाक से प्राप्त हुई. पत्रिका के हर अंक का इन्तजार अब बहुत बेसब्री से रहता है. मुख्यधारा की एकाध पत्रिकाओं को छोड़ दें तो जितना वैचारिक समृद्धि और कलेवर इस पत्रिका का है वह किसी अन्य जगह दिखाई नहीं देता है. पत्रिका ने कुछ ही वर्षों में अपनी अगल पहचान बनाई है. मुक्तकामी अस्मिताओं के आत्मगौरव और संघर्ष के लिए कई और पत्रिकायें अपने बेहतरीन रूप में उपलब्ध हैं पर इस पत्रिका का आस्वाद ही अलग है. इसके लिए इसके सम्पादक ‘विमल थोराट’ और सहायक सम्पादक ‘दिलीप कठेरिया’ विशेष साधुवाद के पात्र हैं. ‘सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एण्ड आर्ट’ की यह त्रैमासिक हर बार अपने नए कहन और कथ्य से हम पाठकों को समृद्ध करती है. पत्रिका का यह अंक राष्ट्र-माता सावित्रीबाई फुले को केंद्र में रखकर विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है. कई गणमान्य लोगों के साथ मेरा भी एक आलेख इस पत्रिका में प्रकाशित है. प्रस्तुत है आलेख ........)  


साहित्य समाज का दर्पण है. जैसे ही आप उस दर्पण रूपी समाज की पहचान करने लगते हैं साहित्य की पोल खुलती चली जाती है. समाज का अंतर्विरोध साहित्य में है. तो क्या हम मान लें कि साहित्य में सभी तरह का समाज है? क्या कोई ऐसा समाज भी है जो साहित्य में नहीं है या बिलकुल गौण है? समाज की सच्ची तस्वीर तो यह है कि इस देश में हजारो सालों तक समाज के नब्बे प्रतिशत लोगों को पढ़ने के अधिकार से वंचित रखा गया. उनके सोचने-समझने पर शास्त्र का पहरा बैठा दिया गया. जिसने बोलने की कोशिश की उसके मुख में जलता पारा डाला गया, जिसने लिखने पढ़ने की कोशिश की उसका अंगूठा काट दिया गया. फिर देश के दस प्रतिशत लोगों ने यहाँ का साहित्य, समाज, राष्ट्र, संस्कृति का ठेका लेकर जो चाहा लिखा.
हिंदी को आलोचकों ने लोकल से लेकर ग्लोबल बनाया बनाया, आधुनिकता आई, फिर हिंदी उत्तराधुनिक भी हो गई. किसी ने यह पड़ताल नहीं की कि आखिर भारतीय समाज की वास्तविकता क्या है? क्या वह वास्तव में खुद को मध्यकाल से कभी अलग कर पाया? क्या वह हजारो सालों से दस प्रतिशत द्वारा देखी जाने वाली वास्तविकता है या उसका स्वरूप कुछ भिन्न भी है?  अगर हम समाज के सच्चे सेवकों के नाम ढूढने चलें तो उनकी संख्या अँगुलियों पर गिनी जा सकती है. हिंदी साहित्य पर गांधी का बहुत प्रभाव है. वहां से आगे चले तो उसकी प्रेरणा भूमि बंगाल तक जाती है. पर हिंदी साहित्य की विडंबना देखिये कि अपने ज्ञान और मेधा का लोहा मनवाने वाले डॉ. आंबेडकर, उनके प्रेरणा पुरुष ज्योतिबा और क्रांति ज्योति सावित्रीबाई का कोई प्रभाव हिंदी आलोचक नहीं देख पाते तो उसका क्या कारण हो सकता है. यही बात जब भारत में शिक्षा पर होती है तो बहुत सारे शिक्षा विदों का नाम लिया जाता है पर शिक्षा और समाज के लिए जान लगा देने वाले सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का जिक्र मुख्यधारा के लोग नहीं करते हैं तो इसका क्या कारण है. 2017 में पहली बार सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाया, इसी से उनके महत्व को पहचाना जा सकता है.

हमारे इस आलेख के केंद्र में वही क्रांति ज्योति सावित्रीबाई फुले हैं जिनके सदप्रयासों से करोड़ो नारियों के जीवन में परिवर्तन संभव हुआ. सावित्रीबाई फुले का जन्म 1831 ई. में महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव नायगांव में हुआ. जिस कालखंड में उनका जन्म हुआ वह समय भारतीय समाज में शूद्र दलितों के साथ भयंकर छुआछूत, भेदभाव, हिंसा और अत्याचार का समय था. स्त्रियों को शिक्षा, संपत्ति, न्याय स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त नहीं था. उनकी जिन्दगी पशुतुल्य थी. सावित्रीबाई फुले और सावित्रीबाई फुले समाज की बुराइयों से ताजिंदगी लड़ते रहे.
19 वीं शताब्दी के पुनर्जागरण एवं सामाजिक क्रांति के अग्रदूत फुले दंपत्ति ने शोषणमुक्त स्वस्थ्य समाज की स्थापना हेतु स्त्री एवं दलित उत्थान में अपना अमूल्य योगदान दिया. शूद्र, अतिशूद्र एवं सभी वर्गों की स्त्रियों की स्थिति में सुधार हेतु शिक्षा प्रसार-प्रचार को आवश्यक मानते हुए सहशिक्षा पाठशालायें, कन्या पाठशालायें, भारत की प्रथम रात्रि पाठशालायें, महिला छात्रावास आदि खुलवाये. 1882 में हंटर कमीशन के समक्ष प्राइमरी शिक्षा को अनिवार्य व निशुल्क करने हेतु प्रस्तुत प्रतिवेदन फुले दंपत्ति का ही था. यहाँ यह कहना सार्थक होगा कि सावित्रीबाई फुले पर उनके पति और तत्कालीन क्रांतिद्रष्टा ज्योतिबा फुले का बहुत प्रभाव पड़ा. सहजीवन में रहते दोनों ने क्रांति की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया. इस अँधेरे समय में इन वर्गों के उत्थान के लिए किया जाने वाला फुले दंपत्ति का काम बहुत ही सराहनीय था. समाज में बालविवाह की घृणित परंपरा व्याप्त थी.
घर पर स्वयं शिक्षा प्राप्त करने के बाद फुले दंपत्ति ने 1 जनवरी 1848 को पुणे स्थित भिड़े की हवेली में लड़कियों के लिए प्रथम पाठशाला का शुभारम्भ किया. यह अपने समय का सबसे क्रांतिकारी समय था. प्रारंभिक तौर पर इसमें कुल छह लड़कियां थीं जिनमें सावित्रीबाई एक थीं. सामाजिक क्रांति का यह कारवां रुका नहीं अपितु उन्होंने 15 मई 1848 को पुणे की हरिजन बस्ती में एक ऐसा स्कूल खोला जिसमें लड़के और लड़कियां सामान रूप से शिक्षा प्राप्त कर सकते थे. पुणे में ही फुले दंपत्ति ने एक सभा आयोजित की जिसमें साठ से अधिक लोग उपस्थित हुए जिसमें सभी जातियों और वर्गों के लोगों की उपस्थिति थी. ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि आधुनिक युग में सामाजिक क्रांति का विचार ही सर्वप्रथम फुले दंपत्ति ने दिया. भगवान बुद्ध के बाद फुले दंपत्ति ने इस देश में महिलाओं के प्रति फैले आडम्बर एवं जटिल कुरीतियों को सशक्त एवं सार्थक चुनौती दी.
भारत में बहुत से सुधारक हुए. कईयों ने उसके लिए अपना जीवन लगा दिया. वर्ण, जाति, क्षेत्र की परेशानियां हैं कि दूर होने का नाम तक नहीं लेती हैं. दिनकर अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में जिन चार क्रांतियों का जिक्र करते हैं वे वस्तुतः युद्ध की उसी बर्बर संस्कृति को बताती हैं जिन्हें ब्राह्मणी संस्कृति पोषण करती रही है. उन्हें बुद्ध और फुले की क्रांति चेतना कहीं भी दिखाई नहीं देती है. यह सच है कि इन पचीस सौ वर्षों की लम्बी अवधि में अनेक साधु-संतों ने जन्म लिया. बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर का कहना था कि ‘इन महात्माओं ने बहुत धूल-मिट्टी उड़ाई किन्तु जाति पीड़ित लोगों का स्तर ऊपर नहीं उठा सके. लेकिन बुद्ध के बाद अगर इन लोगों के उत्थान के लिए लिए किसी ने सच्ची कोशिश की तो वे फुले दंपत्ति ही थे. यही कारण है कि हम फुले दंपत्ति को आधुनिक भारत के ‘सामाजिक क्रांति के प्रणेता’ के रूप में स्मरण करते हैं. बालविवाह, विधवा विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बालिका वध, बहु-विवाह, अशिक्षा जैसे जाने कितने अत्याचार स्त्रियों पर किये जाते थे. उन्हें देवदासी बनाकर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता था. स्त्रियाँ किसी तरह का प्रतिरोध नहीं कर पाती थीं और संपत्ति पर कोई अधिकार नही होने के कारण शोषण का शिकार भी रहती थीं. यह स्त्रियों, दलितों और बहुजनों के लिए बहुत संकट का समय था. चारो तरफ अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देता था. स्त्री को केवल वासना पूर्ति मात्र का साधन समझा गया था. स्त्री को शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं था.
सावित्रीबाई फुले ने अपना पूरा जीवन दलितों, मजलूमों और स्त्री अधिकारों और उनके संघर्ष के लिए लगा दिया. अपने समय में उन्होंने महाराष्ट्र की सत्ता शाही और पेशवाई तथा ब्राह्मणराज का खुलकर विरोध किया. अपने समय में व्याप्त दलित शूद्र विरोधी रुढियों और आडम्बरों से अपने समाज को चेताया. उन्होंने मजबूती के साथ ऐसे गढ़ और मठ तोड़े जो समय सापेक्ष बहुत जरुरी थे. स्वयं रचित साहित्य जिसका उन्होंने प्रतिक्रियावादी ताकतों को कड़ा जबाब देने के लिए बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किया. सावित्रीबाई फुले के साहित्य में उनकी कविताएं, पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि शामिल है. सावित्रीबाई बाई फुले ने दो काव्य पुस्तकों की रचना की जिनमें उनका पहला काव्य-फुले 1854 में तब छपा जब वे मात्र तेईस वर्ष की ही थीं. दूसरा उनका काव्य-संग्रह बावनकशी सुबोधरत्नाकर 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की परिनिर्वाण प्राप्ति के बाद उनकी जीवनी रूप में लिखा था. अपनी कविताओं में उन्होंने प्रेरणा की आग भरी. अपने लोगों को कविता के माध्यम से चेताया और जागरूक किया. उस समय किसी स्त्री का कविता लेखन और वह भी शूद्र समुदाय से आने वाली, यह सबको स्तब्ध करने वाली घटना थी. पर समय रहते उन्हें ठीक से पहचान नहीं मिली. ब्राह्मणवादी संस्कृति ने इतिहास, कला और साहित्य में उन्हें पनपने नहीं दिया.
साहित्य की दुनिया विचारों की दुनिया है. विचार के लिए चाहे गुरु-शिष्य परंपरा हो या विदग्ध लोगों का समुदाय, उनके बीच बातचीत और शास्त्रार्थ जरुरी है. बात-चीत बहुत लंबा अंतराल गुजर जाता है और संवादहीनता बनी रहती है. या अमूमन होता यह है कि शुक्ल, मिश्रा, पाठक, तिवारी, अग्रवाल लिखते हैं शर्मा, सिंह, पांडे साहब पढ़ते हैं और  द्विवेदी, राय, शाही वाह-वाह करते हुए एक आलोचना लिख देते हैं. लेखक भी वही, प्रकाशक भी वही, समीक्षक भी वही. दस प्रतिशत इन्हीं विदग्ध लोगों का समुदाय हिंदी का भाग्य विधाता है. विश्वविद्यालयों में बैठे मठाधीश कब किसे कवि, आलोचक, बड़ा साहित्यकार बना दें कब किसे  किसी बड़े पुरस्कार से नवाज दें, कुछ कहा नहीं जा सकता. हिंदी अकादमियों,  साहित्य अकादमियों,ज्ञानपीठों में जो अँधा बांटे रेवड़ी, आप-आप को देय' स्वयं को विश्वसाहित्य और सभी मनुष्यों की बात करने वाला साहित्य के हजार वर्षों में कभी यादव जी, पटेल जी, वर्मा जी, दुसाध जी को जगह नहीं मिली? समाज की इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण सावित्रीबाई या ज्योतिबा जैसे सशक्त रचनाकार साहित्य के फलक पर ठीक से सामने नहीं आ पाए.
    
सत्रहवी-अठारहवी उपनिवेश बनाने की शताब्दी थी, उन्नीसवीं उसके वैचारिक विस्तार की. बीसवीं इस मानसिक, भौगोलिक उपनिवेशों को तोड़ने की. इक्कीसवीं सदी सूचना साम्राज्यवाद की सदी है जिसमें विचार सूचना में बदल चुका है. ऐसी सूचना जिससे लड़ा नहीं जा सकता, केवल स्वीकार किया जा सकता है’. आज वही समय है जब हाशिये पर पड़े हुए लोगों को उनके पूरे मान सम्मान के साथ साहित्य के फलक पर स्थापित करना है. हिंदी में यह बड़ा काम हिंदी की प्रमुख दलित रचनाकार अनीता भारती ने किया है. ‘विद्रोह की मशाल है सावित्रीबाई फुले की कविताएं’ नामक अपनी पुस्तक की भूमिका में अनीता भारती लिखती हैं कि ‘यह जानकर गहरा आश्चर्य होता है कि 18 वीं शताब्दी में भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रखर, निर्भीक, चेतना सम्पन्न, तर्कशील, दार्शनिक, स्त्रीवादी ख्याति प्राप्त लोकप्रिय कवयित्री अपनी पूरी प्रतिभा और ताकत के साथ उपस्थित होती है और किसी की उन पर निगाह भी नहीं जाती या फिर दूसरे शब्दों में कहूं तो उनके योगदान पर मौन धारण कर लिया जाता है. सवाल है इस मौन धारण का, अवहेलना और  उपेक्षा करने का क्या कारण है? क्या इसका एकमात्र कारण उनका शूद्र तबके में जन्म लेना और दूसरे स्त्री होना माना जाए’ ?[1]
स्त्रीकाल के ऑनलाइन संस्करण के अपने एक आलेख में ललिता धारा लिखती हैं कि ‘19वीं सदी के महाराष्ट्र का शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक व्यक्तित्व होगा, जिसे इतना कम जाना-समझा गया है, जितना कि सावित्रीबाई फुले को. उनके गृह प्रदेश महाराष्ट्र में भी उन्हें मुख्यतः महात्मा फुले की पत्नी या अधिक से अधिक लड़कियों को पढ़ाने वाली पहली भारतीय महिला के रूप में जाना जाता है. परंतु सावित्रीबाई का व्यक्तित्व बहुआयामी था. उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिनके बारे में उनसे पहले किसी ने सोचा भी न था. वे एक ऐसी सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो जाति और लिंग से जुड़े मुद्दों को न केवल अपनी लेखनी और अपने भाषणों द्वारा उठाती थीं वरन वे मैदानी स्तर पर काम करने से भी पीछे नहीं हटती थीं.‘’[2]
मुक्तिबोध अपनी पुस्तक ‘मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का एक पहलू’ में लिखते हैं कि ‘किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए. एक तो यह कि वह किन सामाजिक, मनोवैज्ञानिक शक्तियों के कार्यों का परिणाम है. दूसरा इसका अंतर्स्वरूप क्या है? तीसरा उसके प्रभाव क्या हैं? किन सामाजिक शक्तियों ने उसका सदुपयोग या दुरुपयोग किया है और क्यों? क्या उसने कभी साधारण जन के मानसिक तत्वों को विकसित या नष्ट किया है? सावित्री अपनी कविताओं में उन्हीं प्रेरणा तत्वों को खंगालती हैं जो समाज में भेदभाव को जन्म देते रहे हैं. उन्होंने समय रहते यह समझ लिया था कि गरीबों, दलितों, शूद्रों और अस्पृश्यों को शिक्षा से वंचित रखकर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है. वे जान गई थी कि शिक्षा उस शेरनी का दूध है जिसे पाकर कोई भी दहाड़ सकेगा. उन्होंने अपनी कौम के लोगों को शिक्षित होने की प्रेरणा ही नहीं दी बल्कि उसे अपने जीवन में ठीक वैसे ही उतार लिया. वे अपनी कविता में धर्म, जाति, ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता के गठजोड़ पर कड़ा पर प्रहार करती हैं:
            "हमारे जानी दुश्मन का नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो"[3]     
अभी तक दलितों, वंचितों और स्त्रियों को ऐसा घोड़ा बना दिया गया था जिसकी आँख के बगल में पट्टी लगी होती है और वह उतना ही देख पाता है जितना उसका मालिक उसको दिखाता है. उन्होंने उस पट्टी को हटाने का काम किया ताकि दलित, आदिवासी, शूद्र और स्त्री बाहर की विशद दुनिया का दर्शन कर सकें. वे जानती थीं कि अशिक्षा रूपी अज्ञानता के कारण ही पूरा बहुजन समाज सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना है. इनके पाखंड और कूटनीति के हथियार ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा आदि पर व्यंग्य करती हुई सावित्री बाई फुले कहती है –
ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्खों / स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में ऐसे भ्रम की जगह न कोई / मूर्ख मकड़जाल से निकले न ही
हाथ पर हाथ धरे-बैठे मूर्खों निठल्लो को / कैसे इन्सान कहे?[4] 
अनीता भारती सावित्रीबाई फुले हिंदी कविताओं की को कोट करते हुए उसकी संदर्भिक भूमिका में लिखती हैं कि ‘वे शूद्रों के दुख को, जाति के आधार पर प्रताड़ना के दुख को दो हजार साल से भी पुराना बताती है. सावित्रीबाई फुले इसका कारण मानती है कि इस धरती पर ब्राम्हणों ने अपने आप को स्वयं घोषित देवता बना लिया है और उसके माध्यम से यह स्वयं घोषित ब्राह्मण देवता अपनी मक्कारी और झूठ फरेब का जाल बिछाकर, उन्हें डरा-धमका कर रात-दिन अपनी सेवा करवाते है. सावित्रीबाई अपनी कविता में लिखती हैं कि :
              दो हजार साल पुराना / शूद्रों से जुड़ा है एक दुख
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर / झूठे मक्कार स्वयं घोषित
भू देवताओं ने पछाड़ा है.[5]
       सावित्रीबाई फुले जिन स्वतंत्र विचारों की थी, उसकी झलक उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से मिलती है. वे लड़कियों के घर में काम करने, चौका बर्तन करने की अपेक्षा उनकी पढाई-लिखाई को बेहद जरूरी मानती थी.  शिक्षा ही ऐसा टूल है जो उन्हें बराबरी का हक दिला सकता है. कविताओं की निम्न पंक्तियों से पता चल जाता है कि सावित्रीबाई फुले स्त्री अधिकार चेतना सम्पन्न स्त्रीवादी कवयित्री थी जो स्त्री के कल्याण के लिए तन मन से समर्पित थीं. वे लिखती हैं कि :
                    "चौका बर्तन है बहुत जरूरी है पढ़ाई
 क्या तुन्हें मेरी बात समझ में आई?"
सावित्री के जीवन में केवल कोरी बौद्धिकता ही नहीं है. वे अपने खुद और अपने अपने परिवेश से खुलकर प्रेम करती हैं. जो अपने सहजीवन में प्रकृति से प्रेम नहीं कर सकता वह अपने परिवेश से कैसे प्यार करेगा. काव्यफुले में उनकी कई सारी कविताएं प्रकृति, प्रकृति के उपहार पुष्प और प्रकृति का मनुष्य को दान आदि विषयों पर लिखी गई है. तरह-तरह के फूल, तितलियाँ, भँवरे, आदि का जिक्र वे जीवन दर्शन के साथ जोड़कर करती है. प्रकृति के अनोखे उपहार हमारे चारों ओर खिल रहे तरह-तरह के पुष्प जिनका कवयित्री सावित्रीबाई फुले अपनी कल्पना के सहारे उनकी सुंदरता, मादकता और मोहकता का वर्णन करती है वह सच में बहुत प्रभावित करने वाला है. पीली चम्पा पुष्प के बारे में लिखते हुए वह कहती है-
                     'हल्दी रंग की/ पीली चम्पा
बाग में खिली, ह्रदय के भीतर तक बस गई
पता न चला मन में कब घर कर गई
सावित्रीबाई जानती थीं कि प्रेम सार्वभौम सत्य है. वे अपने सामाजिक और व्यक्तिगत प्रेम के माध्यम से ज्योतिबा के कार्यों में सहयोग करती थीं. सावित्रीबाई फुले अपने दाम्पत्य जीवन में, अपनी आजादी में, अपने आनंद में और अपने सामाजिक काम में ज्योतिबा फुले के प्यार, स्नेह और सहयोग को हमेशा दिल में जगाएं रखती थी. अनीता भारती सावित्रीबाई की हिंदी कविताओं की भूमिका में लिखती हैं कि ‘पचास साल के अपने दाम्पत्य जीवन में वे ज्योतिबा के साथ हर पल, हर समय उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही तथा ज्योतिबा को अपने मन के भीतर संजोकर रखा. ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले जैसा प्यार, आपसी समझदारी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा और समाज के लिए मिसाल है. सामाजिक काम की प्रेरणा के साथ वे अपने काव्य सृजन की प्रेरणा भी ज्योतिबा फुले को ही मानती. ज्योतिबा से मिले ज्ञान के बोध को वे मन की पोटली में बांधकर रखती है’.
जीवन की नाव पति-पत्नी के आपसी समंजन से चलती है. ज्योतिबा हमेशा उनके साथ साथी-संघाती की भूमिका में खड़े होते हैं. यथातथ्य वे सावित्री को सलाह देते हैं और वक्त जरूरत साथी की तरह उनकी मदद भी करते हैं. वे सावित्री से कहते हैं कि सावित्री आप ठीक कहती हैं. अन्धकार विलीन हो चला है और शूद्र और महार जाग चुके हैं:
'सच कही हो तुम, छटा अंधकार / शूद्रादि महार जाग गये
दीन दलित अज्ञानी रहकर दुख सहे / पशु भांति जिए यह उल्लुओं की है इच्छा
मुर्गा टोकरी से ढका रखने पर भी / देता है बांग
और जनता को बताने, सुबह होने की बात'
कविता के अन्त में सावित्री घोषणा करती है-
शूद्र जनता के क्षितिज, ज्योतिबा सूरज
तेज से युक्त, अपूर्व, उदय हुआ.
       सावित्री का दूसरा संग्रह 'बाबनकशी सुबोधरत्नाकर' ज्योतिबा फुले की याद में लिखा गया संग्रह है. यह काव्य संग्रह ज्योतिबा फुले की प्रमाणिक जीवनी के रूप में उनके परिनिर्वाण के एक साल बाद 1891 में उनको सादर समर्पण के रूप में प्रकाशित हुआ. बाबनकशी या बावन तोले यानी बावन पद, जिसमें प्रत्येक पद पाँच- छह पंक्तियों का है. इन बाबन पदों में सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा के जीवन संघर्ष, जीवन दर्शन, और उनके सामाजिक कार्यों द्वारा उस समय शूद्रों महारो स्त्रियों की स्थिति में आए क्रांतिकारी बदलावों का बहुत सच्चाई, प्रेम और सम्मान के साथ वर्णन हुआ है. इस संग्रह की कवितायें अपेक्षाकृत प्रौढ़ कवितायें हैं.
सावित्रीबाई फुले के लिए ज्योतिबा युग चेतना के अविष्कारक हीं नहीं थे अपितु वे युगदृष्टा भी थे. सामाजिक क्रांति को बढ़ावा देने ज्योतिबा ने एक बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ाया लिखाया डॉक्टर बनाया और उसको भी अपने साथ सामाजिक कार्य में जोड़ा. सावित्रीबाई ज्योतिबा से अगाध प्रेम रखती थीं.  सावित्री बाई फुले ज्योतिबा की तुलना संत तुकोबा से करते हुए कहती है - "जैसे संत तुकोबा वैसे संत ज्योतिबा. क्रांतिसूर्य ज्योतिबा का सबसे बड़ा योगदान उनका शूद्र दलित जनता को लगातार शिक्षा की ओर प्रेरित करते हुए बाह्मणवाद के अस्त्र-शस्त्र के पाखंड से निपटने का रास्ता दिखाना भी है.’
क्रांतिकारीः सावित्रीबाई को उनकी कविताओं के माध्यम से उनका जीवन राग और आदिम आकांक्षा को ठीक से समझा जा सकता है. उनकी कविताओं में उनकी पूरी वैचारिकी उभर कर आती है. वे व्यवस्था में अंतर्निहित शोषण की कड़े शब्दों में निंदा करती हैं. उनकी भाषा सीधी और तीखी है और जाति व लिंग के मुद्दों पर वे अपनी बात बिना किसी लाग लपेट के कहती हैं:
मनु कहते हैं / रीतिरिवाजों का आधार है भेदभाव, /
धूर्त और कुटिल लोगों की यह नीति कितनी अमानवीय है/
क्या उन्हें मनुष्य कहा जाए? / पौ फटने से गोधुली तक, महिला करती है श्रम,
पुरूष उसकी मेहनत पर जीता है, मुफ्तखोर, /
पक्षी और जानवर भी एक साथ मिलकर काम करते हैं, /
क्या इन निकम्मों को मनुष्य कहा जाए?
स्त्रीकाल पत्रिका के अपने 19 दिसम्बर 2016 के एक आलेख में सावित्रीबाई के जीवन को कोट करते हुए ललिता धारा ने लिखा है कि ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था, जहां महिलाओं को जंजीरों में कैद रखना चाहती थी, वहीं वह कथित अछूतों को भी समाज के हाशिए पर धकेलती थी और उन्हें पशुवत जीवन जीने पर मजबूर करती थी. वे ऊँची जातियों के लोगों के सामने से नहीं गुज़र सकते थे और ना ही सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी भर सकते थे. फुले दंपत्ति ने सन 1868 में यह घोषणा की कि उनके घर के प्रांगण में बने कुंए से कोई भी अछूत पानी भर सकता है. यह एक अत्यंत साहसिक कदम था, जिसने जातिगत यथास्थितिवादियों को हिला दिया[6]. फुले दंपत्ति यह मानता था कि अंतरजातीय विवाह, जाति प्रथा के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे ऐसे लोगों की व्यक्तिगत रूप से सहायता करते थे जो अंतरजातीय विवाह करने के इच्छुक थे. इसके लिए उन्होंने कई मौकों पर पुलिस की मदद भी ली. उन्होंने कड़े विरोध का सामना करते हुए कई विधवाओं के पुनर्विवाह करवाए.
सावित्रीबाई ने ज्योतिबा के आंदोलनों में रहकर स्वयं को खूब पकाया था. वे वैचारिक रूप से बहुत पुष्ट हुई थीं. बावनकशी सुबोधरत्नाकर में कवयित्री सावित्रीबाई फुले ने अपनी कविताओं के माध्यम से उस समय के इतिहास, स्थिति, परिस्थिति, और उसमें ज्योतिबा फुले के योगदान को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. प्रसिद्ध लेखक एम. जी. माली के अनुसार 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर ज्योतिबा फुले की सबसे पहली प्रमाणिक, उपलब्ध जीवनी है, जिसे सावित्रीबाई फुले ने बावन पदों में काव्यात्मक शैली में लिखा है'. बावली कविता और बावला कवि नामक अपनी कविता में सावित्री का वह रूमानी रूप हमारे सामने आता है जो अपने जीवन के युवा काला में एक युवा मन महसूस करता है. सदियों के अनुकूलन और समाज द्वारा महिलाओं पर थोपी गई वर्जनाओं के बावजूद उनकी कवितायें मुखर होकर अपनी बात रखती हैं. वे अपनी कविता में लिखती हैं कि : 
(वह फरिश्ता) शर्मीली सी है उसकी मुस्कुराहट, / मधुर हैं उसकी बातें, वह उसे उसकी ओर खींचता है, / और आवेग में चूम लेता है/ सुनहरी चंपा/ जैसे मदन करता है आकर्षित अपनी प्रियतमा रति को, / वैसे ही चंपा जगाती है कवि की संवेदनाएं, / …वह देती है आनंद और ऐन्द्रिक सुख, / पारखी को करती है प्रसन्न और फिर नष्ट हो जाती है.
सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले का का सपना था कि लोगों को पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के चंगुल से मुक्त कराया जाय. इसी उद्देश्य से उन्होंने 24 सितंबर, 1873 को सत्यशोधक समाज नामक संस्था की स्थापना की, जो एक नए सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन की कारक संस्था थी. सावित्री, सत्यशोधक समाज की महिला इकाई की प्रमुख थीं. नियमित तौर पर इस संस्था की बैठकें आयोजित होती थीं. इन बैठकों में दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के विभिन्न मुद्दों पर लगातर बात होती थी. लकड़ियों की सही उम्र में शादी, विधवा पुनर्विवाह, अवैध संतानों का संरक्षण आदि भी इन्हीं बैठकों में उठाये जाने वाले विषय थे. सत्यशोधक समाज ने आमजनों को पुरोहितों के चंगुल से निकालने के लिए बिना ब्राह्मण पंडितों और धार्मिक कर्मकांडों के विवाह करवाने की जगह खुश से ये कर्मकांड कराने लगे. फुले दंपत्ति का मानना था कि अंतरजातीय विवाहों से जातिप्रथा का उन्मूलन संभव है. वे अंतरजातीय विवाह करने वालों की मदद करते थे. वे इन विवाहों में वर और वधु केवल यह शपथ लेते थे कि वे एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहेंगे और समाज की भलाई के लिए काम करेंगे. फुले दंपत्ति का प्रभाव यह पड़ा कि इन विवाहों से भारत में अंतर्जातीय और अंतरधार्मिक सिविल विवाहों की नींव पड़ी.
अपने पति की मृत्यु के बाद, सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व संभाल लिया. उन्होंने सासवाण में 1893 में आयोजित समाज की बैठक की अध्यक्षता की. सन 1896 के अकाल में सावित्रीबाई ने अनवरत लोगों की सहायता की और सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह राहत कार्य शुरू करे. सन 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली. हमेशा की तरह, सावित्रीबाई एक बार फिर पीड़ितों की सेवा में जुट गईं. प्लेग ने उन्हें भी नहीं छोड़ा और 10 मार्च, 1897 को इस बीमारी के कारण काल ने उन्हें कालकवलित कर लिया.


डॉ. कर्मानंद आर्य
सहायक प्राध्यापक
भारतीय भाषा केंद्र, हिंदी
दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया
बिहार-823004
Mo- +91- 8863093492 / 9430005835




[1] भूमिका, सावित्रीबाई फुले की कवितायें, अनीता भारती
[2] प्रेम, स्त्रीवाद और सामाजिक क्रांति की कवि, सावित्रीबाई फुले, स्त्रीकाल
[3] सावित्रीबाई फुले की कवितायें, अनीता भारती,  पेज-5
[4] सावित्रीबाई फुले की कवितायें, अनीता भारती,  पेज-2
[5] सावित्रीबाई फुले की कवितायें, अनीता भारती,  पेज-14
[6] स्त्रीकाल पत्रिका, 19 दिसम्बर 2016, ललिता धारा- www.streekal.com

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

असंग घोष : हम ही हटायेंगे कोहरा











हम ही हटायेंगे कोहरा
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पुस्तक समीक्षा :

पुस्तक का नाम :       हम ही हटायेंगे कोहरा
कवि           :      असंग घोष
प्रकाशक :      सानिध्य बुक्स, एक्स/3282, गली नंबर चार, रघुबरपुरा नं – 2
                     गांधीनगर, नई दिल्ली
मूल्य          :      150 रूपये मात्र
कुल पृष्ठ       :      96
प्रकाशन वर्ष     :      2016



असंग घोष उत्पीड़ित समुदायों के आत्म इतिहास में ऐसे विरल कवि हैं जो कविता का एक नया प्रदेश बनाते हैं. वे एक ऐसा जनपद बनाते हैं जहाँ उत्पीड़न न्यूनतम हो. उनकी कविता में रैदास के बेगमपुरा की संकल्पना आप सहज देख सकते हैं. कविता के भोंथरे पड़े प्रतिमानों से उनकी कविता का आस्वाद हो सकता है किसी आलोचक को कम भायेहो सकता है कोई अलंकारवादीरसवादी कविता को लेकर अपनी स्थापनाओं से कविताओं को नकार दे. हो सकता है कविता के नए प्रतिमानों मेंदूसरी परम्परा के कैननों में उनकी कविता को फिट करना कठिन हो. पर उनकी कवितायें इन प्रतिमानों की सीमा रेखा से परे की कवितायें हैं.
वे एक नए सौंदर्यशास्त्र के साथ कविता के इतिहास में पिछले दो दशकों में टिके हुए हैं. आज कविता के वही प्रतिमान नहीं हैं जो कालिदास या बाणभट्ट की कविताओं के हुआ करते थे. कविता के वही कैनन नहीं है जिसमें आसुग ने बाहुबली रासनरपति नाल्ह ने बीसलदेव रासजायसी ने पद्मावत’ लिखा था. कबीर की कविता के प्रतिमानों को आज हम हुबहू लागू नहीं कर पायेंगे. उनकी उलटबासियाँ आज के मनुष्य की समझ से बाहर हैं. आज गुरु और गोविन्द में से गुरु और गोबिंद किसी को नहीं चुनना है. सब अर्थ आधारित तंत्र ने हथिया लिया है. आज तो मान्यवर कांशीराम के शब्दों में गुरुकिल्ली’ की जरुरत है. कविता में उसी गुरुकिल्ली का प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं असंग घोष.
बहुत आगे कहाँ जाएँ सत्तर के दशक की कविताओं और असंग घोष की कविताओं में अंतर है. कविता का पहनावा ओढ़ावा पहले जैसा नहीं है. बहुत सारे कैनन बने हैंबहुत सारे मठ टूटे हैंकई प्रतिमान भरभराकर गिर रहे हैं पर कविता शाश्वत है. उसकी अंतर्वस्तु में कोई बहुत अंतर नहीं पड़ा है. उपन्यास तो मध्यवर्ग तक आया पर कविता लम्बे कालखंड तक सामंती हाथों में रही. अभी उसका रूप संवर रहा है. कविता अब उन्हीं उत्पीड़ितों के हाथ में आयी है जिसमें लिखा गया था लोहे का स्वाद लुहार से नहींउस घोड़े से पूछो जिसके मुँख में लगाम है’. आस्वाद की जगह आज स्वाद कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. अब कोई कविता काव्य है कला? कला है अथवा जीवन कविता क्या है से बहुत आगे निकल गई है. उसी आगे की धारा में निकले हुए कवि हैं असंग घोष.
हम और हमारा समाज भले ही तीसरी सदी में जी रहा होपर हम उत्तरआधुनिक होने को लालायित है. ऐसा लगता है बाजार की शक्तियां केवल भारत को लील रही हैं और कविता उसके आगे लाचार है. कविता लाचार हो सकती हैअब उत्पीड़ित लाचार नहीं हैं. वंचितों के मुख में आवाज आयी है. अब उन्हें उनके लिए किसी बोलने वाले की जरुरत नहीं है. वे लिख पढ़ और गा रहे हैं. कविता में वे गहन पीड़ा को अभिव्यक्त कर रहे हैं. कलावादियों को उन्होंने धकेल दिया है. आस्वाद को साधारणीकरण तक ले आये हैं. उनके अन्दर रसराज श्रृंगार’ नहीं जुगुप्सा भय’ और क्रोध’ अधिक है.
आज जब कविता पोइट्री मैनेजमेंट’ की तरफ बढ़ रही है. दोपदिया सिघार और तोता बाला घोष के नाम से अनाम भाषा में लिखी जाने वाले कवितायें चर्चा में हैं. वहां एक ऐसे कवि के बारे में बात करना लाजिमी है जो सब मंदिरमस्जिदगढ़ तोड़कर मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होने का आग्रही है. वहां एक ऐसे विरल कवि के बारे में बात करना लाजिमी है जो कविता लिखता नहीं अपितु कविता जीता है. अपने दुःख से समाज को मिलाता है. जहाँ उसे लगता है सर्वम दुक्खं’. वह सोचता है ऐसी कौन सी परिस्थियाँ रही होगीं जब तथागत के मुख से यही बात निकली होगी. क्या उनका समुदायवाद असंग का समुदायवाद हैक्या संबुद्ध की पीड़ा ही असंग की पीड़ा हैतब हमें सोचना होगा कि आखिर में कविता ने अब तक क्या किया हैक्या वह आजतक आस्वाद के सहारे रही. उसने दुःख दूर करने का कोई उपक्रम नहीं खोजा. क्या वह भी सर्वम दुक्खं’ की हिमायती रही? 
हम ही हटायेंगे कोहरा’ असंग घोष का पांचवां कविता संग्रह है. इस कविता संग्रह की कवितायें अपने रूप और आकार में पहले से ज्यादा चुस्त हैं. यहाँ कवि पहले की अपेक्षा थोड़ा और सॉफ्ट हुआ है. कविता बयान मात्र नहीं रह गई है बल्कि अब उसमें थोड़ा बांकपन आ गया है. कहन वही है पर कहने का तरीका अलग है. आक्रोश का स्वर थोड़ा धीमा पड़ा है. इस कविता संग्रह में बुद्ध की अपेक्षा करुना को अधिक जगह मिली है. लोकतंत्र में कवि की आस्था थोड़ी और दृढ़ हुई है. इन कविताओं में प्रजतान्त्रिका मूल्यों के क्षरण पर शोक और करुना मिश्रित संवाद अधिक हैं. इस संग्रह की पहली कविता पक्षियों को बीजा दो’ पक्षियों से अधिक कहीं मनुष्य और मनुष्यता की कविता है. निरंतर खोते जाते मूल्यों और अस्मिताओं कि चिंता आखिर कौन कर रहा हैकवि की सत्ता जितनी भी है वह प्रतिरोध के साथ खड़ा है. इस कविता संग्रह की शुरआत उसी कविता से है.
उनकी कविता आज की नारी’ में स्त्री के साथ होते आये छल को कवि सहज उद्घाटित कर देता है. कवि स्त्रीशूद्रोनाधीयताम के शंखनाद को अपनी कविता में चुनौती देता है. वह विप्र कवि तुलसी के मुख को लाल कर देता है और पूछता है कि आखिर शूद्रपशु और नारी तुम ब्राह्मणों की दृष्टि में ताड़न के अधिकारी क्यों हैंक्या तुम्हारी विभेदकारी सृष्टि में स्त्री का कोई स्थान नहींअसंग प्रश्न उठाते हैं कि तुलसी तक तो ठीक है पर उन्हीं के वंशज आचार्यरामचंद्र शुक्ल और तथाकथित मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा क्या सोचते हैंक्या उनकी स्त्री तुलसी की स्त्री दृष्टि से कुछ अलग है. असंग मिथक को तोड़ते हैं:
इंद्र की दृष्टि से/तूने/ एक स्त्री को पथरा दिया/
ताकि वह डरी रहे हमेशा/ न करे विरोध तेरी कुटिलता और कुदृष्टियों का/
तू पाँव छूने से होने वाले/ उद्धार को गौरवान्वित मत कर/ स्त्री जान चुकी है /
ब्रह्माकृष्ण/ वायु/पराशर/ वृहस्पति/राजा दंड के /
मिथकों में किये अपहरण बलात्कार
                                         (हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ १३ )  

असंग खोती हुई परम्पराओं को लेकर चिंतित हैं. बुरी परम्पराओं को तो मिट ही जाना चाहिए पर ऐसा कभी नहीं होता कि सब बुरा ही बुरा मिटे. कभी कभी सबसे अच्छा भी मिट जाता है. नई पीढियां उन अच्छाइयों को महसूसने से वंचित रह जाती हैं. उन्हें अपने पूर्वजों का उत्पीड़न भूल जाता है. पर यहाँ कवि आश्वस्त करता कि हमें चिंतित नहीं होना चाहिए. शायद ऐसा समय की जरुरत हो. वे अपनी माँ और पिता’ नामक अपनी कविता में खुद के जीवन और फिर उसके बाद अपनी पीढ़ियों का जिक्र करते हुए लिखते हैं :
       आजकल के बच्चे/ बरू के बारे में जानते ही कहाँ है
       वे तो एकदोतीनचारपांचदसबीस/ पचीस-पचास
पैसों के सिक्कों के/ प्रचलन से वंचित ही रहे/ आगे की पीढ़ियाँ तो
इन्हें जान भी नहीं पायेगी/ वैसे भी मेरा बेटा/ रांपी चलाना नहीं जानता है
यह उसने सीखा ही नहीं/ और शायद/ अब जरुरत भी नहीं
(हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ १५)
उत्पीड़ितों की कविता में अब यही परिवर्तन है. पारंपरिक पीढियां अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ रहा है. आज वह उसकी मज़बूरी नहीं है. शायद कवि भी इसी परिवर्तन को इंगित करता है कि समय के साथ बहुत सारी गर्द को साफ़ होना ही चाहिए. पीढियों को गंदी और बुरी चीजें छोडनी ही होंगी.
       उदय प्रकाश की एक प्रसिद्ध कविता है सूअर’ और इसी सन्दर्भ को लेकर बाबा नागार्जुन की एक कविता है बारह थनों वाली’ और इसी श्रृंखला में असंग की कविता है राक्षस हो जाना चाहता हूँ’ जिसमें कवि खाते पीते शताब्दी के सूअरों की बात करता है. यहाँ कई सन्दर्भों में एक निरीह पशु है सूअर जो कभी मिथक में बाराह’ की तरह जाना जाता था. यहाँ पहले असंग कि कविता देखें :
       खदेड़ने कि भरसक कोशिश की मैंने/ बावजूद इसके घुस आया है
       खेत में अपना थूथुन उठाये/ मेरी फसल को नेस्तनाबूद करते हुआ/
       जंगली सूअर/ मेरी हर कोशिश बेकार हो गई/ इसके सामने तो अब तो मुझे
       इन्तजार है अपने दांतों के / तीक्ष्ण होने का
सचमुच मैं तेते मिथकों का राक्षस हो जाना चाहता हूँ
(हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ २० )  
यहाँ देखें तो कविता के बिम्ब बदले हुए हैं. कोई सूअर जैसा निरीह और घृणित प्राणी क्यों होना चाहेगाहर कोई शेर होना चाहता है. भाषा विभेद ने पशुओं को तो नहीं छोड़ा पर हाँदलित वंचित रचनाकार स्वयं को ऐसे अलंकरण से अपमानित नहीं करता अपितु उसके गुणों को ग्रहण करते हुए अपने दांत नुकीले करना चाहता है.    
       आज दलित वंचित निरीह और बेचारा नहीं है. संविधान के कारण उसने अपनी शक्ति को बढ़ाया है. उसने अपनी ताकत विकसित की है. आज वह करोडपति बिजनेश मैंन भी है. आज डिक्की जैसी संस्थाओं का वह सफलतापूर्वक संचालन भी कर रहा है. आज टीना डाबी जैसी उसकी बेटियां आईएएस जैसी कठिन परीक्षाओं में टॉप कर रही हैं. आज दीपा कर्माकर जैसी दलित बेटियां भारत का मान बढ़ा रही हैं. रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के कारण देश एक जुट हो रहा है. आज पंजाबी की युवा गायिका बाबा साहब आंबेडकर के गानों को दुनिया में फैलाकर उन्हें अमरता का पथ दे रही है. आज जाने कितने दलित बंत सिंह’ हत्या और बलात्कार के बाद चुप नहीं है. आज दलित सामूहिक होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं जो यह परिवर्तन साहित्य का भी अंग बना है. कवि असंग अपनी कविता तेरा घोड़ा मेरे कब्जे में है’ में लिखते हैं :
       मैं एकलव्य नहीं हूँ/ मेरा अंगूठा अपनी जगह कायम है/
       न ही मैं कर्ण हूँ/ मेरा कवच/ चिरस्थायी हो चुका है
       नहीं आने वाला तेरे झांसे में / तू आ लड़ मुझसे / तेरा घोड़ा मेरे कब्जे में है
                                                              (हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ ३०)
उनकी कविता बेजोड़ छल’ बने हुए मिथकों पर सीधा प्रहार करती है. सदियों से सत्ता अपने हित को साधने के लिए कैसे अपने प्रतिमान बनाती है और सत्ता की भागीदारी को सुनिश्चित करती है. कैसे वह अपनी पीढ़ियों और अपने बीजों में कुतर्क को स्थापित करती हुई शक्ति का संधान करती है. हम ही हटायेंगे कोहरा’ दलित कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि की ठाकुर का कुआँ’ की बरबस याद दिला जाती है.
   उनकी कविता में एक अजीब तर्कवाद है जिसमें आक्रोश बड़ी सिद्दत के साथ आता है. मलखान सिंह की कविताओं की भाषा में कवि बोलता है सुनो ब्राह्मण’:
तुम बामनपारा में / घुसते हो रोज / कभी सांझ ढले
कभी अल्लसुबह/ बगल में दबा निकलते हो
अपने पोथी पतरे को / लोगों को चूतिया बनाने
                                  (हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ ७०)
इसी तरह से उनकी कवितायें उन ब्राह्मणवादी मूल्यों को समूल ध्वस्त कर देना चाहती हैं जिसने देश की सत्तर प्रतिशत आबादी का जीना मुहाल कर रखा है. जिसने ऊंच-नीच का भेद भाव रचा है. जहाँ मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जा रहा है. कवि ऐसे मनु की संहिताओं को जलाने के पक्ष में है जो विभेदकारी हैं. जिनसे सभ्य मनुष्यों को खतरा है. दीमकों चाटो’ नामक कविता में कवि की कामना है कि :
कहते हैं दीमकें चाट जाती हैं किताबें
पोथी पतरा और ग्रन्थ
फिर वे क्यों नहीं चट कर पायीं
वेदपुराणउपनिषद और मनुस्मृति ?
बताओ तो!
                                                (हम ही हटायेंगे कोहरापृष्ठ ८३ ) 
इसी तरह से असंग घोष अपनी कविताओं में एक महा आख्यान रहते हैं. वे उत्पीड़न का दंश झेलते हुए उत्पीड़न को नेस्तनाबूद होने का सपना संजोते हैं. इसीलिए कहीं कहीं उनकी कविता में आक्रोश मुखर हो जाता है. करुना पीड़ा को कहते कहते कलात्मक नहीं रह जाती. उनकी कविता में मनुष्य के गुणों अवगुणों की अभिव्यक्ति हो जाती है. दलित चेतना में असंग की कवितायें एक अलग सुर और साधना की कवितायें हैं. 




खामोश नहीं हूँ मैं
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पुस्तक समीक्षा :
पुस्तक का नाम :       खामोश नहीं हूँ मैं
कवि :                असंगघोष
प्रकाशक :             शिल्पायन, शाहदरानई दिल्ली
मूल्य :               125 रूपये
प्रकाशन वर्ष :          2011

कविता आदमी होने की तमीज है. यह तमीज लम्बे संघर्ष और यातना के साथ आती है. असंगघोष की कविताओं से वैसी ही गंध फूटती जान पड़ती हैजिनसे हम वर्षों मरहूम रहे हों. असंगघोष जनप्रिय कवि हैं. उनकी कवितायेँ सिद्ध करती हैं कि भाषा’ जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल होता है. ओमप्रकाश वाल्मीकिनामदेव ढसालनाज़िम हिकमतपाब्लो नेरूदाऔर कबीर की परंपरा की उनकी कविताओं को देखकर लगता है कि इक्कीसवीं सदी की शैशवावस्था में जब साहित्य के कुलीन साधक यथार्थ की दुनिया से पलायन कर उत्तर-आधुनिकता का घोंसला गढ़ रहे हैंतक एक कवि ऐसा भी है जो मनुष्यता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है.
अपने अन्य संग्रहों  समय को इतिहास लिखने दो’ ‘हम गवाही देंगे मैं दूंगा माकूल जवाब के साथ खामोश नहीं हूँ मैं उनका चौथा कविता संग्रह है. वे हमारे साथ जी रहे वैसे असंख्य लोगों के बारे मेंकच्छे घरचक्की, लालटेनसिलबट्टे पर पीसी हुई मिर्च की चटनीचूल्हे की आग जैसे कई चित्र उकेरते हैं जो समय की शिला पर कहीं फिसल गए हैं. उनकी कवितायेँ जमीन के गहरे जुड़ाव की कवितायेँ हैं. कवि अपनी कौम से सवाल करता है : समय/ मांगता है/ मुझसे हिसाब / पढ़े क्यों नहीं ! वे नई हवा’ को सावधान करने वाले कवि हैं. वे साहित्य में कई मौलिक प्रश्नों के साथ एक विमर्श शुरू करते हैं.
विमर्श का यह बीज उनके दैनन्दिन जीवन से आता है. ये मूल स्वभाव में बुरे वक्त’ से निपटते आदमी की कवितायेँ हैं. कुछ कवितायेँ मनुष्य की अपनी जातीय मार्मिकता की याद दिलाती हैं. पूंजीवादी वर्चस्व’ के इस क्रूर समय में कवि अपना आभ्यन्तर खोल कर रख देता है. इस संग्रह की लगभग सभी कविताओं में आक्रोश’ प्रकट हुआ है. कवितायेँ उद्वेग’ की जगह तार्किक विवेक के साथ सामने आती हैं. इस संग्रह में मोना तुम मरी क्यों’ ‘नदी सदियों से प्यासी है’ ‘समय और मैं’ ‘सुनो ब्राह्मण तुम्हारी पवित्रता’ ‘मीठा कांदा’ गौरैया’ जैसी अनेक महत्वपूर्ण कवितायेँ हैं.
इस पर चलते हुए/ कब/मैं दलदल में/ भीतर तक उतर गया
पता ही नहीं चला/और/ जब मैंने महसूसा कि/ मैं धंसा जा रहा हूँ
तब/ मेरे पास केवल हाथ बचे थे/ जिन्हें जीने की चाहत में
भरसक कोशिशों की तरह/ मारता रहा इधर-उधर  

उनकी कवितायेँ मनुष्यों के साथउनके षडविकारों से प्रेम की,  पशुओंकीड़ोंचीटियों और आजीविका के उस अंतिम पायदान पर खड़े मनुष्य की कवितायेँ हैं.

       इसी संग्रह में उनकी एक बहुत छोटी कविता है गणेश बताओ तो’. इस कविता में कवि भारत में फैले अंधविश्वास और बाजार दोनों को एक साथ बरत लेता है. इस विज्ञान सम्मत आधुनिक समय में जहाँ लोग आज भी मूर्तिपूजा, कर्मकांडबाबाओं के चक्कर में पड़े हुए हैं वहीं पर कवि को दिखाई देता है कि आम आदमी इस संकट भरे समय मेंहारते हुए समयबाजार की जकड़न के बीच आखिर कौन सा रास्ता उसके लिए बचता है. उसके लिए एक तरफ कुआँ है तो दूसरी तरफ गहरी खाई दिखाई देती है. फासीवादी ताकतों से बचने का अब कौन सा उपाय बाकी है. कवि लिखता है कि :
       गणेश!/ तुमने दूध क्या पिया
       फासीवाद ने / मेरा दरवाजा खटखटायाऔर
       घर में घुस आया/ बताओ तो तुम अब क्या पीने जा रहे हो
                                                (खामोश नहीं हूँ मैंपेज 20)
वह इक्कीसवीं सदी में जब दुनिया विज्ञान के चरम पर है और सामाजिक रूप से मनुष्य विकास की ओर है तो एक बड़ा समाज है जो समाज के मैले को अपने सिर पर लादकर ढो रहा हैऐसे ऐसे घृणित कर्म कर रहा है जो निंदनीय हैवह सदी हुई लाशें उठा रहा है. सड़े हुए जानवर का निस्तारण कर रहा है. खेती में अपने कुनबे को डुबा रहा है. कवि भारत के जातिविहीन होने की संकल्पना से भरा हुआ है. वह स्वयं जाति से पूछता है :
       ओ जाति! तू जाती क्या
       बेड़िया तोड़बंधन मुक्त कर
तू जाती क्याओ जाति!!
(खामोश नहीं हूँ मैंपेज 21)
जाति ने बहुत बड़े बहुजन तबके को लीला है. पिछड़ी जातियों को भी सामजिक धार्मिक स्तर पर निरंतर अपमान ही सहना पड़ा. ये जातियां निरंतर पिछड़ती ही गईं. इनका आर्थिक पतन हुआ. सदियों कि दासताशोषणदमन और उत्पीड़न के कारण हीन भावना से ग्रसित और सारे अत्याचारों के शिकार होने के लिए विवश एक अभिशप्त जाति समाज में कैसे सिर उठाकर चल सकती थीयहाँ हर कोई यह मानता है कि गरीब अपनी गरीबी के लिए स्वयं जिम्मेदार है. इससे विकट स्थिति और क्या हो सकती है. देश में जातिवाद कि जड़े इतनी गहरी हैं कि बिना उसे कुचले हुए सामजिक परिवर्तन असंभव है. उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा स्थान है. असंग उसी जातिवाद के बढ़ते वर्चस्व पर अपनी कलम चलाते हैं.
       इसी संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है नदी सदियों से प्यासी है’. कवि लिखता है कि :
       कल कल करती / अभिशप्त नदी
       सागर तक जा पहुंची / अथाह जल देख फिर चिल्लाई
मैं प्यासी हूँ / सागर अशांत किनारों से
टकराकर शोर मचाता कहता / मैं तो सहस्त्राव्दियों से प्यासा हूँ
प्यासी नदी दौड़ी दौड़ी / सागर की प्यास बुझाने
सागर में समाहित हो जाती है
                                         (खामोश नहीं हूँ मैंपेज 27)
कवि यहाँ अपनी कलात्मता के उच्चतम शिखर का परिचय देता है. अजस्र बहने वाली नहीं का बिम्ब लेते हुए कवि यहाँ बताता है कि नदी जानती है कि वह बहुत प्यासी है. उसके दो किनारे कभी भी एक नहीं हो पाते. वे दिन रात छटपटाते रहते हैं. वेगवान नदी स्वयं को बाँधने का उपक्रम करती है. यहीं यह वंचित समुदाय से आने वाला कवि प्रकृति को अपने बहुत निकट पाता है. समाज और प्रकृति के नियम एक जैसे हैं. कवि अपनी व्यथा अपनी अंतिम कविता लिखता है :
मैं भी परिंदों की भांति/ अनंत मुक्ताकाश में
विचरण करना चाहता हूँ/ पर
जाति के बोझ से झुके कंधे/ मुझे उड़ने नहीं देते
इन्हें कैसे हल्का करूँ!
पेट भरते कि चिंता/ अर्थाभाव की बेड़ियों ने
मेरे पैरों को जकड़ा हुआ है/ निष्ठुर समाज ने
होश सँभालने से पहले / मेरे पर काट दिए हैं, किन्तु
मन के पैरों को फडफडाने से कैसे रोकूँ
छाहता हूँ उड़ना / कोई बताये कैसे उडूँ
                                         (खामोश नहीं हूँ मैंपेज 80)

                                 


समय को इतिहास लिखने दो
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पुस्तक समीक्षा :
पुस्तक का नाम :       समय को इतिहास लिखने दो
कवि           :      असंग घोष
प्रकाशक :      शिल्पायन, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य          :      200 रूपये
कुल पृष्ठ       :      120




कवितायें घुलकर लिखी जाती हैंघुलकर पढ़ी जाती हैं और कुछ जिन्हें पाठक अपने जीवन का अंग बना लेता हैऐसी ही रचनाओं के लिए शायद शब्द बना होगा कालजयी’. कालजयी वस्तुतः और कुछ नहींकाल का अतिक्रमण मात्र है. ऐसी कवितायें जो समाज के ताने-बाने में मध्यममार्ग का अनुशरण करती हैं. जीवन का एक सूत्र देती हैं जहाँ सब शुभाशुभ ही नहीं जीवन जगत का फैलाव भी रहता है. समाज और सामाजिक विडम्बनाओं का समुच्चय. जातिवादक्षेत्रवाद, सम्प्रदायवादसामंतवादमार्क्सवादराष्ट्रवादवाद वाद वाद और कहीं कहीं इनका संवाद. मूल विन्दु गायब ही रहता है. पर रहता तो यही है.
असंग कविता जगत के पुराने महारथी हैं और पिछले बीस सालों से यह अलख जगा रहे हैं. उनकी कवितायें प्रतिरोध की कविताएँ हैं जो जीवन के संघर्ष से अनुभव करके निकली हैं. यह भारत में स्थित उन सवर्ण मार्क्सवादियों का छद्म प्रतिरोध नहीं है जो समाज की वास्तविकता को समझे बगैर रटंत तोते का व्यवहार करता रहा है. जिसने कभी समाज को समझा ही नहीं और भारतीय वास्तविकता को पश्चिमी नजरिये से ही देखता रहा.
असंग घोष की शिल्पायन प्रकाशन नईदिल्ली से किताब आई है समय को इतिहास लिखने दो’. प्रस्तुत संग्रह में पचास से अधिक कवितायें संग्रहीत हैं. असंग अपने पुराने तीन कविता संग्रहों से इस संग्रह में अधिक मुखर हुए हैं. कविता संग्रह में आदिकवि, हिसाब लेकर ही रहूँगामैं ही तुम्हें छोड़ देता हूँआहुतिदीवारें कब गवाही देंगी?, यक्ष प्रश्न,मंघाराममाँ है नदीसमुद्र: तीन कवितायेँलम्पटवल्दी कोरी की दफाईघरतेरी कालिखसीढियाँविद्रोहहुनरतेरी चुप्पीओ मृत्यु तुम चली आओ जैसी महत्वपूर्ण कवितायें इसी संग्रह में है. उनकी प्रसिद्ध कविता है आदिकवि जो इसी तरह का प्रतिरोध रचती है.
सत्ता का वर्चस्ववादी धड़ा लम्बे समय तक सत्ता में आने के लिए मुख्यधारा बना बैठता है और जो मुख्यधारा होती है उसको कहीं हाशिये पर लाकर छोड़ देता है. कभी कभी यही अस्मिता की राजनीति के रूप में उभर कर आता है पर अपवंचित धारा का यह साहित्य केवल अस्मिता की राजनीति भर नहीं है. वह साहित्यकलासंस्कृतिराजनीति आदि में अपनी सशक्त दावेदारी को सुनिश्चित करता है. हिसाब लेकर ही रहूँगा’ नामक अपनी कविता में असंग लिखते हैं कि :
       तूने/ अपनी इच्छानुसार/
सब पाया क्योंकि तू शातिर था/
जानता था छल विद्या/ और हमें छलता रहा/
करता रहा शोषण हमारा/
तुम्हारी कुटिलता/ और छल के आगे/ मेरी इच्च्यें ही पत्थर हो गई/
लेकिन मेरी संघर्ष यात्रा/ अब भी जारी है/ एक दिन/
देना ही होगा/ तुम्हें/ मेरे शोषण का हिसाब
                                         (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज १५)
विभेद साहित्य की जड़ों में है क्योंकि वहां एक खास मानसिकता काम करती रही है. इतिहास हमेशा की तरह विजेताओं के साथ खड़ा रहता है. उसी इतिहास के सामानांतर एक और इतिहास होता है जो अपने अस्तित्व की तलाश लगतार करता है. कवि लिखता है कि :
आदिकवि/तुम कवि थे/ कवित्त करते रहे/
तुम्हारी तरह बाद के कवि भी/ लिखते रहे/
अभिज्ञान शाकुंतलम/ तुम दूबे रहे प्रेम में/ भक्ति में / रस में/ छंद में/
आमोद में/ तुम्हारा ध्यान/ हासिये बसे /
लोगों तक कभी गया ही नहीं/ तुम्हें तो पता ही नहीं था/वे कौन थे?
                                  (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज १२)  
उदारवाद-बाजारवाद के साथ जो जातिवाद का गठबंधन नब्बे के बाद उभरा है उसी का विशद आख्यान है असंग की कवितायें. बदला कुछ भी नहीं है. न ब्राह्मणवाद कम हुआ है न पूंजीवाद का प्रकोप. दिखाई तो यह दे रहा है कि जिसे हम देवता मान रहे हैं उसी के भीतर कोई रक्तबीज भी छुपा हुआ है. नवब्राह्मणवाद निरंतर बलवान हो रहा है. जातियों के संगठन बहुत मजबूत हुए हैं. यह जो अर्द्धशिक्षित समाज आया है जाति के मामले में वह अधिक कुंठित है. असंग यहाँ परम्परा से चली आ रही पीड़ा को इस कविता के माध्यम से हमारे सामने रखते हैं कि एक बड़ा वर्ग है जिसे श्रम के मूल्यहीन होने के कारण दुःख झेलना पड़ा है. बुद्धि के वर्चश्व में अकारण ही स्वयं को श्रेष्ठ स्थापित करके करोड़ों लोगों को नरक में जीने के लिए मजबूर कर दिया. असंग लिखते हैं :
तुम्हारी तरह कवित्त नहीं करते थे वे/ सिर्फ बुनते थे/
ताना बाना/ जिसे ओढ़ते रहे तुम/ कभी/ रामनामी/ कभी कृष्णनामी//तुम कवि थे/
तथकथित महान सभ्यता/ संस्कृति के वाहक?/
जिसमें बुनने वाला/ हमेशा की तरह नदारद था/ भूलकर उन्हें /
करते रहे स्तुतिगान/ तुम सचमुच थे महान
                                         (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज ११-१२)  
संप्रभु वर्ग अपनी इसी श्रेष्ठता बोध के कारण सदियों से खुद को पूज्य बनाता रहा है. एक आम आदमी भले ही न समझता हो पर आदि कवि जिन्हें हंसों के जोड़े को देखकर करुना पूरित होकर रामायण’ लिख दिया था वही अपने समाज के अन्त्यजों की पीड़ा को क्यों नहीं समझ पाया. क्या कला और साहित्य के नाम पर उसके पूर्वजों का ढोंग सदियों से नही चल रहा है. क्या वह लगातार एक बड़े समुदाय को अपने बनाये हुए मूल्यों के हिसाब से गढ़ता बनाता रहा है.  तू मौन क्यों है?’ नामक अपनी कविता में असंग लिखते हैं कि :
तुम्हारे/ तमाम तरह के हथियार/मेरे बैरी क्यों हैं?/
तुमने हमारे पुरुखों का ही वध क्यों किया/इक्कीस बार धरा से/
क्षत्रियों का नाश करने वाला/ वह तेरा ही पुरुखा क्यों था?
                                  (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज २८)
सत्ता राजनीति की शक्ति प्राप्त करने के लिए दलित कई स्तरों पर संघर्ष कर रहे हैं. मार्क्सवादी ब्राह्मणवाद को दलित शक्ति पछाड़ कर पीछे छोड़ रही है. उन्हें न सवर्ण सहानुभूति की जरुरत है न मार्क्सवादी मानववाद की. सच तो यह है की पश्चिम की दिमागी गुलामी से चिंतित होना तो दूर भारत जैसे तीसरी दुनिया के लोग भूमंडलीकरण और प्रगति विकास’ के नाम का जाप कर रहे हैं बस. गाँधीलोहियाअम्बेदकर उनके लिए मात्र मुखौटे रह गए है. यदि एक सन्दर्भ वित्तीय पूंजी के भूमंडलीकरण का है तो दूसरा आर्थिक उदारीकरणनिजीकरण का है. तीसरा सन्दर्भ बाजारवादविश्वगाँवरोजगारों पर हमला और हड़पवाद आदि का विकराल रूप दिखाई देता है. आज दलित-आदिवासी साहित्य के पास ऐसे सैकड़ो युवा चेहरे हैं जो नित नया कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं. जिनका ह्रदय विशाल हुआ है और उनके साहित्यिक प्रतिमान दलित साहित्य के प्रतिमानों पर बिलकुल खरे उतर रहे हैं. असंग की कवितायें इसी परिवेश के भीतर प्रतिरोध रचती कवितायें हैं. आ मेरे साथ बैठ’ कविता में निराला की कविता वह तोड़ती पत्थर’ की छाया दिखाई देती है. पर वहां श्रम अनुभवजन्य नहीं है वहां सहानुभूति की छाया लेकर रचनाकार कविता में उतरता है पर असंग घोष की कविता आ मेरे साथ बैठ’ में कवि का अनुभव अपने जीवन का विदग्ध अनुभव है. यहाँ अनुभूति अपने भोगे की चरम पराकाष्ठा के रूप में उभरती है. कवि लिखता है कि :
तू/ आ मेरे साथ बैठ/ बीड़ी पी/फेफड़े जला/ घन उठा/
पत्थर तोड़/ पसीना बहा/ हथौड़ा छेनी पकड़/ पत्थर तराश/
बना खजुराहो की मैथुनरत मूर्तियाँ/ अथवा प्रेम का प्रतीक ताजमहल/ और अपने हाथ कटा
                                         (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज ३६ )
भारत स्वयं को सोने की चिड़िया बताता रहा है. वह देश जिसकी आम जनता हजारो सालों तक शिक्षा से वंचित रही हो वह देश सोने की चिड़िया कैसे हो सकता है. वह बहुजन जनता जिसे अपने जीवन के मूलभूत अधिकार ही नहीं मिले वह सोने की चिड़िया होने का ख्वाब ही देख सकता है.
    लम्पट’ नामक अपनी कविता में लिखते हैं कि :
गलाफाड़ कर/तुम्हीं कहते रहे हो/ हमारे संस्कार/
हमें बनाते हैं महान/और इन संस्कारों से ही/
यह महादेश विश्वगुरु बना है /लेकिन/ जरा विस्तार से बताओगे/
तुम्हारा कौन सा संस्कार/ तुम्हें बनाता है विश्वगुरु/ लम्पट कहीं के........
                                         (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज ४८)
उनकी घर कविता प्रकृति और उनके अन्य जीवों के साथ साहचर्य की कविता है जो दुनिया के बहुत सारे संसाधनों को जोड़कर अपना घर बनाती है. वह घर जो सबके सपने में आता है पर नसीब किसी किसी को होता है. यहाँ कवि ने गौरैया के जीवन संघर्ष का जो ताना बाना चुना है वह बहुत ही संवेदनशील धरातल पर उभरकर आता है. कवि लिखता है कि :
गौरैया ने घर बनाया था/ मेरे घर के बरामदे में/
जहाँ डायनिंग टेबल के/ ऊपर ट्यूबलाईट लगी है/
वहां आने जाने लगी बार-बार वह/ उसने थोड़े ही देर में रखे/
कुछ घास के तिनके/ ट्यूब लाईट की /
रॉड और चाक / दोनों के ऊपर बेतरतीब.
यहाँ कवि आधुनिक विकास के उन जगहों को पहचानता है जो अपने विकास के बड़प्पन पर इतराए घूमते हैं पर दुनिया के वे जीव को आधुनिक जीवन में स्वयं के लिए संघर्ष कर रहे हैं वे उसी तरह से घोसला बना लेते हैं जैसे महानगरों में रहने वाले दलित दमित वर्ग के लोग अपना जीवन यापन करते हैं. घर जीवन का अंतिम पायदान नहीं है. आदमी अपना बसेरा बसाता है और समय पूरा करके एक दूसरी दुनिया में प्रस्थान कर जाता है. कवि लिखता है :
कल से/ ट्यूबलाईट की/ रॉड और चाक/
दोनों के ऊपर/ बने इस घर में / कोई नहीं आया है/
न नर न मादा न नन्हा सुनाई नहीं देती अब/
चीची की आवाज
                                         (असंगघोष,  समय को इतिहास लिखने दोपेज ६४)



  
समीक्षक :
डॉ. कर्मानंद आर्य
सहायक प्राध्यापक
भारतीय भाषा केंद्र, हिंदी
दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय
चंदौती मोड़, विनोबा नगर, गया
बिहार – 823004
मो. +91-8092330929/8863093492/9430005835


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